पिछले कई सालों से मैं बच्चों के बीच हूँ, उन्हें पढ़ा रहा हूँ, और उनके बदलते तौर-तरीकों को बेहद करीब से देख रहा हूँ, क्योंकि एक होम ट्यूटर होने के नाते मेरा नाता सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके मन, उनकी आदतों और उनकी टेबल पर रखे स्मार्टफोन की स्क्रीन तक भी पहुँच जाता है। कुछ समय पहले तक जब मैं किसी बच्चे को पढ़ाने बैठता था, तो मेरी चिंता सीधी होती थी — होमवर्क हुआ या नहीं, चैप्टर समझ आया या नहीं, और अगले टेस्ट की तैयारी कैसी है। लेकिन पिछले कुछ समय में यह तस्वीर तेज़ी से बदली है, क्योंकि अब बच्चे के हाथ में सिर्फ किताब और नोटबुक नहीं, बल्कि AI भी है। आजकल जब मैं किसी छात्र के घर जाता हूँ, तो अक्सर माता-पिता बड़ी तसल्ली से बताते हैं कि “सर, आजकल तो यह मोबाइल पर AI की मदद से अपनी पढ़ाई खुद ही कर लेता है,” क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका बच्चा ChatGPT, Gemini या किसी और AI टूल से अपने CBSE या UP Board के मुश्किल चैप्टर सॉल्व कर रहा है। मगर एक ट्यूटर के चश्मे से जब मैं उसी बच्चे की स्क्रीन पर झाँकता हूँ, तो जो हकीकत सामने आती है, वह पढ़ाई से कोसों दूर और थोड़ी चौंकाने वाली होती है। यह भी पढ़ें: AI kya hai? बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों के लिए Zero से समझें (Simple Hindi Guide) बच्चे फोटो-वीडियो के साथ AI में क्या कर रहे हैं अपनी ट्यूशन क्लासेस में और बच्चों से बातचीत करते हुए मैंने जो सबसे पहले नोटिस किया, वह यह है कि बच्चों के लिए AI कोई “स्टडी टूल” नहीं, बल्कि एक नया “जादुई खिलौना” बन चुका है, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अपनी तस्वीरें और वीडियो बनाने का बढ़ता क्रेज़। बच्चा माता-पिता का फोन लेकर चुपचाप अपनी या घर के किसी कोने की तस्वीर खींचता है और उसे किसी भी AI ऐप पर अपलोड कर देता है, ताकि खुद को किसी सुपरहीरो, कार्टून या फंतासी दुनिया के अवतार में देख सके। कई बार तो बच्चे घर के अंदर के पारिवारिक वीडियो तक AI टूल्स में डाल देते हैं, ताकि उनसे कोई मज़ेदार क्लिप बन सके, और उन्हें यह सब एक खेल जैसा लगता है — एक ऐसा जादू जिसमें वे अपनी मनचाही दुनिया रच रहे होते हैं। AI से “दोस्ती” और कोडिंग का बढ़ता शौक इसके अलावा एक दूसरा ट्रेंड भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ा है, और वह है AI को अपना दोस्त मान लेना, क्योंकि AI बिल्कुल इंसानों की तरह मीठी और समझदारी भरी भाषा में जवाब देता है। मैंने देखा है कि बच्चे चैटबॉट्स से अपने स्कूल के किस्से साझा करते हैं, और कई बार तो अपनी पर्सनल फीलिंग्स या घर की बातें भी बता देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि स्क्रीन के उस पार कोई है जो उन्हें बिना डाँटे सुन रहा है। कोडिंग को लेकर भी उतना ही उत्साह दिखता है — बच्चा AI से कहता है “मेरे लिए एक छोटा गेम बना दो,” और कुछ ही देर में उसे एक बेसिक गेम का कोड मिल जाता है, जिसमें मेरे हिसाब से अपने आप में कुछ गलत नहीं है, बशर्ते सही मार्गदर्शन मिले, क्योंकि यही जिज्ञासा बच्चों को क्रिएटिविटी और प्रॉब्लम-सॉल्विंग सिखा सकती है। असली समस्या तभी शुरू होती है जब बच्चा यह सोचे बिना AI इस्तेमाल करने लगे कि वह उसमें क्या जानकारी दे रहा है। UNICEF की parent guidance में बच्चों द्वारा AI को emotional support या बातचीत के लिए इस्तेमाल करने, privacy, personal information और AI dependency जैसे मुद्दों पर चर्चा है। यह भी पढ़ें: Generative AI kya hai? ChatGPT पढ़ाई में कैसे मदद करता है (आसान हिंदी में) वीडियो और गेमिंग में जोखिम और भी बड़ा एक पेरेंट या टीचर के तौर पर मुझे सबसे ज्यादा चिंता प्राइवेसी यानी निजता के खत्म होने की होती है, क्योंकि जब कोई बच्चा अपनी तस्वीर किसी अनजान AI सर्वर पर अपलोड करता है, तो उसे यह अंदाज़ा भी नहीं होता कि वह डेटा कहाँ जा रहा है और उसका आगे क्या इस्तेमाल हो सकता है। यहाँ सिर्फ चेहरा मायने नहीं रखता, बल्कि तस्वीर में स्कूल यूनिफॉर्म दिख सकती है, पीछे स्कूल का नाम आ सकता है, घर का कोई हिस्सा नज़र आ सकता है, या किसी दुकान, सड़क या लैंडमार्क से पूरी लोकेशन का अंदाज़ा तक लगाया जा सकता है। डिजिटल पेरेंटिंग की अदृश्य बाउंड्री एक शिक्षक के तौर पर मेरा मानना है कि तकनीक बुरी नहीं है, बल्कि बिना सही मार्गदर्शन के यह एक खुला मैदान बन जाती है जहाँ बच्चा कहीं भी भटक सकता है, और इसीलिए डिजिटल पेरेंटिंग आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुकी है। आपको अपने बच्चे से फोन छीनने की ज़रूरत नहीं, बल्कि एक अदृश्य बाउंड्री खींचनी है — जैसे घर में यह नियम बनाना कि पढ़ाई या AI का इस्तेमाल हमेशा हॉल जैसे खुले हिस्से में होगा, बंद कमरे में नहीं। अगर आप अपना फोन दे रहे हैं, तो कोशिश करें कि उन AI ऐप्स से “कैमरा” और “गैलरी” की परमिशन हटा दें, ताकि बच्चा सिर्फ टेक्स्ट टाइप करके अपने सवाल पूछ सके। बच्चे को डराने की ज़रूरत नहीं, न ही यह कहना है कि “AI बहुत खतरनाक है, इसे इस्तेमाल मत करो,” बल्कि उसे एक छोटा-सा सवाल सिखाना काफी है — “इस फोटो को AI में डालने से पहले क्या मैं इसे किसी अनजान सर्विस के साथ शेयर करना चाहता हूँ?” यह छोटी-सी आदत आगे बहुत काम आ सकती है। NCERT के Central Institute of Educational Technology ने भी parents के लिए अपनी “Empowering Parents with AI” सीरीज़ में AI के फायदों के साथ प्राइवेसी, स्क्रीन टाइम और responsible digital behaviour जैसे मुद्दों को शामिल किया है, यानी यह सिर्फ किसी एक ट्यूटर की चिंता नहीं, बल्कि पूरे education ecosystem का सरोकार बन चुका है। यह भी पढ़ें: AI से पढ़ाई कैसे करें? छात्रों के लिए 10 Practical तरीके जो आपकी पढ़ाई बदल देंगे क्या इसका मतलब है कि बच्चों को AI से रोक दिया जाए मेरे हिसाब से बिल्कुल नहीं, और शायद यही इस पूरी बात की सबसे ज़रूरी सीख है, क्योंकि अगर बच्चा AI से कार्टून बना रहा है, इमेज बना रहा … Read more